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Saturday, September 29, 2012

विश्व पार्श्व संगीत

विश्व पार्श्व संगीत
 मानव और उसकी सोच,स्वयं पर ही उसका अपना अधिकार साथ में तथाकथित "प्रकृति "  को जान सकने की अपनी आकांक्षाऔर इससे भी अधिक जितना जानते हैं उसका अभिमान वास्तव में यह हमारी प्रकृति है जो सास्वत"प्रकृति "से इतर हमरा स्वयं का भ्रम है जिसे जितना जानना आवश्यक है उतना ही मन लेना भी
मानवता को सुस्पष्ट करते  करते उसके अपने सीमा रेखा का व्याख्यान देने वाली " सनातनी " श्री मद भग्वद गीता " के साथ साथ अन्य भी अब तक मानव को एक "दर्शन" देतें है न की "दृश्य "
दर्शन कभी दृष्य  और दृढ़  नहीं होता :अतः यदि इसकी उपयोगिता को सार्वभौमिकता की सीद्धि  से० सम्बन्धित करें तो कुछ सत्य से प्रतीत  होने वाले तथ्यों से मिल पाएंगे
वर्णित चरित्रों  से अलग मानव का अपनी
प्रकृति
सीमाए
कृत्य और निर्धारण
समाज और प्रभाव
परिणाम
प्रतिक्रिया
गती
इसके बाद ही

 







  इसका शीर्षक जीवन-चक्र के पार्श्व में मंद गति  से चलने वाले उस अनुभव की अभिव्यक्ति है जिससे यह लगभग  स्पष्ट हो जाता है की सार्वभौमिक नियमो से प्रेरित यह हमारा जीवन सदा अपने कृत्य और लक्षण और लक्ष्य के निर्धारण के लिए बाध्य है
जिज्ञासा की धारा जब किसी भी विषय पर आंशिक रूप से  पैनी हो जाये और परिदृश्य के पार्श्व में  चले रहे उस विशेष ध्वनि को अनुभव कीजिये जिससे आत्मसात करते ही हमारे मन मस्तिष्क में अनुकूलता ,समानता ,निर्धारण और  समाप्ति के एक से स्वरुप दिखाई देते हैं और इस सिद्धांत की पुष्टि की और जाने वाला मार्ग दिखाई देने लगता है लेकिन साथ ही प्रसस्ती के साधन का विस्तार इतना अधिक है की हमारे अध्ययन  उसे किसी एक विषय में समेट पाने में अश्मर्थ हो जाते है कालांतर यदि कोई बिरला इन सिद्धांत में से किसी एक का परिचय पाता है  वह उस सम्पूर्णतावादी सिद्धांत का आंशिक रूप अपने सम्पूर्ण जीवन के अध्ययन से पाता है