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Tuesday, February 26, 2013

MURAAD

"sea" love of  Manjhi (the bot man)

यू तो हर शख्स की किसी शय का गुलाम हैं 
वख्त की बेड़ियाँ पड़ी हैं मेरे पैरो में 
मेरे हुदूद पर भी उसका लगाम है 
इंसानियत बंद हैं अब हसरतो के समन्दर में
पिरोये' ख्वाबों के मोती जो लहरों तक मैं आया था 
ये आसूं तेरे ये मोती भी, ख्वाब तूने ही बनाया था 
तेरे लहरों के इशारे मेरे हाथो ने थामे  ,मै साहिल पे खड़ा था अर्शों से 
हजारो रंग तेरे तू दरिया ही सही , मैं देख कर ही सहमा था बर्षों से 
जो तू दरिया तो तेरा "दिल" भी होगा, तुझ पर मरते है कई तो कहीं  दर्द भी होगा 
तेरी ताशीर  ही है "आसूं" सी , तू कभी रोई भी होगी
तेरी लहरे ढूढतीं   है "कुछ" किनारों पे।। तू कभी खोई भी होगी  

तेरे गह्रइयो तक तेरे बुलाने से , मैं छोड़ आया हु शाहिल एक जमाने से
तेरी गहराईयो ने ही दिए वो अरमानो के मोती पिरोये बैठा था एक शाम से 
मै अदना मांझी हु तेरा मेरी अवकात क्या, मेरा नाम भी होता है तेरे नाम से 
ये अल्फाज़ मेरे नहीं मेरे इश्क के हैं
जो तू समझे तो पूरा हूँ  मैं ,शायद मिट जाऊंगा यू गुमनाम  से  
तू कहा है तू दिखती नहीं, मैंने ढूंढा मुझमे मिलती नहीं
 "दरिया " भी कभी सिमटता पर तुझ पर यह शय  खिलती  नहीं 
 अब तो देख  मेरी प्यासी निगाहों को, 
मई प्यार तेरा तू मेरी है, छोड़ दे सारे गुनाहों को ........................... इस दर्द का दायरा इतना बड़ा क्यूं है पड़ रहा जीना हर वक्त आसूओ से,
खता भी उनकी अपनी है ,दर्द भी ये अपना है
जो महसूस कर रहे है वह मर्ज भी अपना है,
ये रास्ता है -समन्दर, और रूह भी है प्यासी, ये खारा सा समन्दर है, हर तरफ ही उदासी
ये मंजिल भी समन्दर और आसूओं सी है मंजिल,तलाश भी है उनकी हर वक़्त दायरे में-
दायरा नमक सा और याद है रूहानी -बेवक्त बेअदब सी इस कश्ती की कहानी
एक प्यासा सा मांझी, हलफ भी है बेनम
ना बयाँ के है काबिल उसकी शक्श की कहानी
जब दरया ने पूछा ये उदासी क्यों है इस खूब समंदर में बदहवासी क्यों है-
मांझी की आखे छलक सी आई खारे पानी को खारी सी दास्तां सुनाई
वो आँसू भी खारे समन्दर भी खारा- माझी ,दर्द की तड़प समन्दर समझ न पायी
बेंइतेहा समन्दर में कुछ बूंदें ही समायी
बेबसी के मांझी से एक और आवाज आइ ..............................
और बोला ...
बेशक ये प्यास तेरे जहर से जाएगी, जो मिल गया मै तुझमे तू तड़प कर रह जाएगी,
मेरा दायरा है लानत तेरे कद के आगे, तू खुद को खुद में ढूंढ नहीं पायेगी
सच है तू संमदर तेरी जात भी, सूखे रेत सी रह जाएगी औकात भी
मुझ सी प्यास जब आएगी तेरे आगे, तब तुझे हवा भी बहा ले जाएगी...